श्री गोस्वामी तुलसीदास जी के दार्शनिक सिद्धांत

200.00

एक दिन संयोगवश मुझे एक पुस्तक की पांडुलिपि देखने को मिली। जिज्ञासावश जब उसे पढ़ना शुरू किया, तो ज्ञात हुआ कि वह बाबा द्वारा लिखित ‘गोस्वामी तुलसीदास जी के दार्शनिक सिद्धान्त’ विषयक ग्रंथ है। प्रारंभ में दर्शनशास्त्र को कठिन समझकर मैंने उसे अलग रख दिया, परंतु ‘रामचरितमानस’ के प्रति अपने संस्कारों और उत्सुकता के कारण पुनः उसे पढ़ना आरम्भ किया। जैसे-जैसे अध्ययन आगे बढ़ा, मैं आश्चर्यचकित रह गई। बाबा ने तुलसीदास जी के दर्शन को मानस के पात्रों, उनके संबंधों और जीवन-व्यवहार के माध्यम से अत्यंत सरल एवं व्यावहारिक रूप में प्रस्तुत किया है।
‘रामचरितमानस’ केवल एक महान काव्य नहीं, बल्कि गहन दार्शनिक चिंतन का भंडार भी है। इस पुस्तक के माध्यम से पाठकों को जीवन की अनेक जिज्ञासाओं और समस्याओं के समाधान की नई दृष्टि प्राप्त होगी। इसी विचार से मैंने इस पांडुलिपि को पुस्तक रूप में प्रकाशित करने का प्रस्ताव अपने भाई-बहनों के समक्ष रखा। सामूहिक प्रयास और पारिवारिक संस्कारों के बल पर यह कार्य संभव हो सका।
इस पुस्तक का प्रकाशन हमारे लिए अपने पूज्य पिताजी को समर्पित भावपूर्ण श्रद्धांजलि है। हमें विश्वास है कि इसके अध्ययन से पाठकों को आध्यात्मिक आनंद, वैचारिक मार्गदर्शन और जीवनोपयोगी प्रेरणा प्राप्त होगी। ‘सुनिधी पब्लिशर्स’ द्वारा इसका प्रकाशन हमारे लिए विशेष हर्ष का विषय है।

Weight 144 kg
Dimensions 14 × 21.5 cm

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